फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन परिचय/हिंदी लेखक फणीश्वर नाथ रेणु/
फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन परिचय
फणीश्वर नाथ रेणु हिन्दी साहित्य के एक आँचलिक कथाकार है
इनका जन्म 4 मार्च, सन् 1921 ई. में बिहार राज्य के
पूर्णनिया जनपद के औराही हिंगना नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम शिलानाथ मंडल
था। इन्होंने आजीवन संघर्षों का सामना किया।
सन् 1942 में इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में
बढ़-चढ़कर भाग लिया। सन् 1950 में इन्होंने राणाशाही विरोधी आंन्दोलन में भरपूर
योगदान दिया।
पुरुस्कार- फणीश्वर नाथ रेणु को अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित किया
गया।
इनका प्रथम उपन्यास ‘मैला आँचल’ के लिए भारत सरकार द्वारा सन् 1970 में
इन्हें ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका
है।
रचनाएँ-
फणीश्वर नाथ रेणु आधुनिक हिंदी साहित्य के आँचलिक
कथाकारों में से एक है। इनकी रचनाएँ इस प्रकार है-
कहानी संग्रह-
ठुमरी, पहलवान की ढोलक, अगिर खोर, आदिमरात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, मारे गए गुलकाम आदि।
‘’तीसरी
कसम’’ फिल्म ‘मारे गए गुलकाम'
कहानी पर आधारित है।
उपन्यास- मैला आँचल, परती परिकथा, कितने चौराहें, दीर्घतया आदि।
इनका मैला आँचल उपन्यास 1954 ई. में प्रकाशित
हुआ जो हिंदी का प्रसिद्ध उपन्यास है।
संस्मरण- वन तुलसी की गंध, ऋणजल, श्रुत-अश्रुतपूर्व आदि।
रिपोर्ताज- रेणु रचनावली, नेपाली क्रांति कथा आदि।
साहित्यिक विशेषताएँ-
फणीश्वर नाथ रेणु को हिंदी साहित्य में एक आँचलिक
उपन्यासकार के रुप में सफलता मिली है। इन्होंने अपने उपन्यासों में ग्रामीण
समस्याओं को रेखाकिंत किया है। इन्होंने गाँव में फैली गरीबी, भूखमरी, शोषण, विषमता तथा कुरीतियों का वर्णन किया
है। इन्होंने गाँव के लोक गीतों, लोक
संस्कृति तथा लोक-परम्पराओं पर भी प्रकाश डाला है।
भाषा शैली-
आँचलिक
कथाकार होने के कारण फणीश्वर नाथ रेणु जी ने प्राय: आँचलिक भाषा का प्रयोग
किया है। वैसें इनकी भाषा,
सरल, सहज व स्वभाविक है। इनकी भाषा में अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी शब्दों के साथ तत्सम और तद्भव शब्दों का भी प्रयोग मिलता है।
इनकी भाषा में गाँव की आँचलिक तथा नगरीय भाषा का मिश्रण दिखाई देता है। अत: इनकी भाषा सरल, सहज, स्वभाविक, आकर्षण और प्रवाहमयी है।
मृत्यु-
फणीश्वर नाथ रेणु का निधन 11 अप्रैल, सन् 1977 ई. में हो गया था।
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