कुँवर नारायण का जीवन परिचय/हिंदी कवि कुँवर नारायण/
कुँवर नारायण का जीवन परिचय
कुँवर नारायण नई कविता के प्रमुख कवियों में से एक है। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 19 सितम्बर, 1927 को हुआ था।
आरम्भिक
शिक्षा स्थानीय स्कूल में पूरी करने के बाद वे लखनऊ चले गए और वहाँ से उच्च शिक्षा
प्राप्त की। कुंवर जी ने विज्ञान वर्ग से इंटर तक की शिक्षा पूर्ण की थी। इन्होने
लखनऊ विश्वविद्यालय से सन् 1951 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की शिक्षा
प्राप्त की। अध्ययन के दौरान ही वे हिंदी साहित्य का ज्ञान भी प्राप्त करने लगे
थे।
कुँवर
नारायण एक कुशल सम्पादक तथा विनोदप्रिय कवि थे। ये ‘युग चेतना’ ‘नया प्रतीक’ ‘छायानट’ पत्रिकाओं के सम्पादक मण्डल से भी जुड़े
हुए थे।
पुरुस्कार-
इन्हें
विभिन्न पुरुस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है- जिनमें से ज्ञानपीठ पुरुस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, प्रेमचंद सम्मान, कुमारन पुरस्कार, कबीर राष्टीय सम्मान, शलाका सम्मान आदि प्रमुख है।
रचनाएँ-
कुँवर नारायण का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण
स्थान रहा है उन्होंने साहित्य में अनेक विधाओं की रचनाएँ की है जो इस प्रकार है-
काव्य
संग्रह–
चक्रव्यूह
(1956), तीसरा
सप्तक, परिवेश
हम-तुम, आमने-सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों आदि।
प्रबंध
काव्य– आत्मजयी।
रचनाएँ-
कहानी संग्रह– आकारों के आस-पास।
समीक्षा– आज और आज से पहले।
साक्षात्कार– मेरे साक्षात्कार।
कुंवर
जी का आत्मजयी काव्य का सन् 1989 में इतालवी भाषा में अनुवाद रोम से
प्रकाशित हुआ था।
साहित्यिक
विशेषताएँ-
एक
भ्रमणशील व्यक्ति होने के कारण कुँवर नारायण ने पाश्चात्य साहित्य का गम्भीर
अध्ययन किया है, इसलिए
कविता के प्रति उनका दृष्टिकोण पूर्णत: वैज्ञानिक है। इन्होंने भावुकता को अपनी
कविताओं में स्थान नहीं दिया है। वे अपनी कविताओं में समकालीन समाज की यथार्थ
झांकी प्रस्तुत करते है। इन्होंने अपनी रचनाओं में मानवतावाद का भी वर्णन किया है।
सामाजिक चेतना को महत्व देते हुए वह रुढ़ियों व जड़-परम्परा का विरोध करते हुए दिखाई
देते है।
भाषा
शैली-
कुँवर
जी की भाषा, सरल, सहज, स्वभाविक है। भाषा और विषय की विविधता
कुँवर नारायण की कविताओं के विशेष गुण है। अतः उन्होंने विषय-विविधता के साथ-साथ अनेक भाषाओं
का प्रयोग भी किया है। उनके काव्य की प्रमुख भाषा साहित्यिक खड़ी बोली है जिसमें
अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, तत्सम और तद्भव शब्दावली का भी प्रयोग
है। इनके काव्य में अलंकारों का प्रयोग भी स्वभाविक रुप से हुआ है।
मृत्यु-
कुंवर नारायण जी का 15 नवम्बर सन् 2017 को 90 वर्ष की आयु दिल्ली में निधन हो गया
था।
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