सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय
सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय
👉सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) हिन्दी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उन्हें ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ कहा जाता है, क्योंकि उनकी कविताओं में प्रकृति की सुंदरता और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम मिलता है।
हिंदी साहित्य में सुमित्रानंदन पंत छायावाद के लोकप्रिय कवि माने जाते है। उनका जन्म सन् 1900 ई. में उत्तरांचल के अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक स्थान पर हुआ था। उनका बचपन का नाम गौसाई दत्त था।
👉इनके पिता का नाम श्री गंगादत्त और माता का नाम सरस्वती था। इनके जन्म के कुछ समय पश्चात्त इनकी माता का निधन हो गया था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इनके गाँव में ही हुई इन्होंने घर पर ही हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला भाषा का अध्ययन किया।
महात्मा गाँधी और रवींद्रनाथ टैगोर ने पंत जी को अत्यधिक प्रभावित किया। वे महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हो गए।
👉पुरुस्कार- पंत जी को साहित्यिक विशेषताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरुस्कार, सोवियत लैंड नेहरु पुरुस्कार और भारतीय ज्ञानपीठ पुरुस्कार प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण उपाधि से सम्मानित किया।
सुमित्रानंदन पंत अल्पायु से ही कविताओं की रचना करने लगे थे। इन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में प्रकृति का मनोहर वर्णन किया है इसलिए इन्हें प्रकृति के सुंदर कवि या सुकुमार कहा जाता है। प्रेम रुपण, रहस्यानुभुति, शोषितों के प्रति सहानुभुति, शोषकों के प्रति घृणा, मानवतावाद इनके काव्य की उल्लेखनीय विशेषताएँ है।
👉रचनाएँ- पंत जी की रचनाओं का वर्णन इस प्रकार है-
काव्य कृतियाँ- उच्छ्वास(1922), वीणा(1927), पल्लव(1927), युगवाणी(1929), गुंजन(1932), युगांत(1937), ग्रंथि(1939), ग्राम्या(1940), स्वर्ण किरण और स्वर्णधूलि(1950), चिदम्बरा(1958), लोकायतन।
चिदम्बरा कृति के लिए इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरुस्कार और लोकायतन पर सोवियत लैंड पुरुस्कार प्राप्त हुआ।
नाटक- रजत, रशिम, ज्योत्स्ना, शिल्पी।
कहानियाँ एवं संस्मरण- पाँच कहानियाँ, साठ वर्ष और एक रेखांकन।
👉भाषा शैली-
पंत जी की भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। इन्होंने साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग किया है। जिस पर संस्कृत के तत्सम् शब्दावली का प्रभाव देखा जा सकता है। इनकी भाषा में कोमलता के साथ-साथ संगीतात्मकता भी है। भाषा की सुंदरता बढ़ाने के लिए इन्होंने अलंकारों का भी प्रयोग किया है।
👉इनके बारे में डॉ. नगेंद्र लिखते है-
‘पंत प्रधान रुप से कलाकार है। इनके काव्य में सबसे प्रथम कला का, उसके उपरान्त विचारों का और अंत में भावों का स्थान है।’
मृत्यु-
इस महान कवि का निधन सन् 1977 में हुआ।
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