मीरा बाई का जीवन परिचय
👉मीराबाई 16वीं सदी की सगुण भक्ति काव्य की एक प्रसिद्ध कृष्ण भक्त, कवयित्री और संत थी। इनका जन्म सन् 1498 ई. में मारवाड़ रिसायत के कुड़की नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम राजा रत्नसिंह था। बचपन में ही इनकी माता का निधन हो गया था।
जिसके बाद ये अधिकतर
समय अपने दादा राव दा के पास गुजारती थी। प्रारम्भिक शिक्षा इन्होनें अपने दादाजी
के पास रहकर ही प्राप्त की थी। इनके दादा बड़े ही धार्मिक एवं उदार प्रवृति के
व्यक्ति थे जिनका गहरा प्रभाव मीरा के जीवन पर पड़ा।
लेकिन पति की मृत्यु
के बाद उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागकर कृष्ण भक्ति को ही अपना मार्ग बना लिया।
फिर मीराबाई मन्दिरों में जाकर साधु संतों की संगति करने लगी और कृष्ण की उपासिका
बन गई। मीराबाई ने समाज और परिवार के विरोध के बावजूद कृष्ण के प्रति अपनी अटूट
भक्ति को बनाए रखा।
👉साहित्यिक परिचय-
मीराबाई बचपन से ही
कृष्ण भक्त थी। इनके काव्य का मुख्य स्वर कृष्ण-भक्ति था। वे कृष्ण को अपना पति
मानती थी और लोक-लाज को छोड़कर श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहती थी। इनके काव्य में
इनके ह्रदय की सरलता स्पष्ट रुप से प्रकट होती है।
👉रचनाएँ-
श्रीकृष्ण के
विभिन्न पदों की रचना मीराबाई द्वारा की गई है इन्होनें प्रेम भरे कई पद भी गाये
है इनकी रचनाएँ इस प्रकार है-
नरसी जी का मायरा, राग गोविंद, गीत गोविंद की टीका, राग-सोरठ के पद और मीरा पदावली आदि।
कृष्ण के प्रति
निस्वार्थ प्रेम और भक्ति के कारण उन्हें 'राजस्थान की राधा' कहा जाता है।
👉साहित्यिक विशेषताएँ-
मीरा के काव्य में
कृष्ण की भक्ति पर बल दिया गया है। उनकी भक्ति कान्ता भाव की माधुर्य भक्ति है।
इन्होनें प्रेम के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का वर्णन किया है। मीरा ने सामाजिक
और वैचारिक बन्धनों का विरोध किया और लोक निंदा की प्रवाह न करते हुए पर्दा प्रथा
का पालन नहीं किया, वे सचमुच नारी मुक्ति की आवाज बनकर उभरी।
👉भाषा शैली-
मीरा की भाषा राजस्थानी है, जिसमें गुजराती तथा ब्रजभाषा का मिश्रण देखा जा
सकता है साथ ही खड़ी बोली,
पंजाबी और पूर्वी भाषाओं का भी प्रयोग उनकी
रचनाओं में पाया जाता है। इनकी रचनाएँ विभिन्न राग-रागनियों पर आधारित है।
गेयता, संगीतात्मकता इनके काव्य के विशेष गुण है। इनकी
भाषा सरल एवं सहज है। इनके इष्ट देव तो कृष्ण ही है, किंतु
रामकथा से सम्बंधित गेयपद भी इन्होनें लिखे है। मीरा की कविताएँ शिष्ट समाज के
साथ-साथ राजस्थान के भीलों में भी बहुत लोकप्रिय है।
👉मृत्यु-
मीराबाई
की मृत्यु द्वारका में सन् 1546 ई. के आसपास मानी जाती
है। वे कृष्ण भक्ति करते-करते श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा गई थी।
👉निष्कर्ष- मीराबाई भक्तिकाल की सबसे प्रसिद्ध संत कवयित्री बनी। उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़कर कृष्ण भक्ति को अपनाया। आज भी उनके पद और भक्ति गीत मंदिरों और सत्संगों में गाए जाते है।
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