हिंदी को ही राजभाषा क्यों बनाया गया?
हिंदी को ही राजभाषा क्यों बनाया गया?
👉भारत बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है। हमारे यहाँ अनेक भाषाओं की समृद्ध परंम्परा है। हम सबने यह कहावत भी सुनी है-
‘’कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी।’’
यह हमारे राष्ट्र के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है। देश के विभिन्न प्रांतो में अलग अलग भाषाएं बोली जाती हैं। इसमें हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो सभी भाषा-भाषियों के बीच सेतु का काम करती है। इसे बोलना, समझना, लिखना, पढ़ना अपेक्षाकृत आसान है।
हिन्दी भाषा का इतिहास बड़ा समृद्ध है।
भक्तिकाल में उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक अनेक सन्तों ने हिन्दी में अपनी रचनाएँ कीं और लोगों का मार्गदर्शन किया।
केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों वल्लभाचार्य, रामानुज, रामानन्द आदि ने भी हिंदी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था।
18वीं शताब्दी में राजस्थान के कई राजवाड़े हिन्दी (ब्रजभाषा) में कार्य कर रहे थे।
1816 ई. में एक अंग्रेजी मिशनरी, विलियम केरी ने लिखा कि हिन्दी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं, बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।
क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग अपने प्रदेश तक ही सीमित है जबकि हिंदी का सरोकार पूरे हिंद (हिंदुस्तान) से है।
भारत के स्वाधीनता संग्राम में हिंदी ने जन-मानस को जोड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
‘’महात्मा गाँधी गुजराती थे, सी. राजगोपालाचार्य मद्रासी थे। राजाराममोहनराय, ईश्वरचन्द्र विघासागर व देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय जैसे महान दार्शनिक व क्रांतिकारी बंगाली थे। ऐसे ही देश के क्रांतिकारियों ने स्वाधीनता का संदेश देश भर में जन-जन तक पँहुचाने के लिए हिंदी को चुना।''
भारत में हिन्दी का पहला समाचार पत्र ‘’उदन्त मार्तण्ड’’ था जिसका सम्पादन ‘’श्री जुगल किशोर शुक्ल’’ ने दिनांक 30-05-1826 को किया। इस पत्र का प्रकाशन ‘’कलकता’’ से हुआ।
‘’राजा राममोहन राय’’ द्वारा प्रकाशित सप्ताहिक पत्र ‘’बंगदूत” के कुछ पृष्ठ हिन्दी में भी छपते थे। जिसका प्रकाशन ‘’कोलकता’’ से ‘’1826’’ ई. में हुआ।
1872 में आर्य समाज के संस्थापक महार्षि दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज के प्रमुख ग्रंथ “सत्यार्थ प्रकाशन” की भाषा भी हिन्दी ही रखी।
1882 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने शिक्षा आयोग (हन्टर कमीशन) के समक्ष अपनी गवाही दी जिसमें हिन्दी को न्यायालयों की भाषा बनाने की महत्ता पर बल दिया।
1878 में ‘’भारतमित्र'' नामक हिन्दी समाचार पत्र का कलकता से प्रकाशन हुआ। इसे कचहरियों में हिन्दी प्रवेश आन्दोलन का मुखपत्र कहा जाता है।
महात्मा गांधी ने 1917 में, भरूच में गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में अपने भाषण में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि–
“भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जा सकता है क्योंकि यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है; यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम है तथा इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है।”
इन्हीं कारणो से 14 सितम्बर सन् 1949 को संविधान सभा ने लम्बी चर्चा के बाद, हिन्दी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया।
इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये “14 सितम्बर” का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के पश्चात ‘’प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद’’ ने अपने भाषण में बधाई के कुछ शब्द कहे।
उन्होंने कहा, "आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जब कि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी। इस अपूर्व अध्याय का देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा"।
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