मुंशी प्रेमचन्द का जीवन परिचय/उपन्यास सम्राट/हिंदी के प्रसिद्ध लेखक/

                                                             मुंशी प्रेमचन्द का जीवन परिचय 

                                                    

👉मुंशी प्रेमचन्द हिंदी साहित्य के महान् कथाकार थे। वे भारत के उपन्यास सम्राट माने जाते है जिनके युग का विस्तार सन् 1880 से 1936 तक है। यह कालखंड भारत के इतिहास में बहुत महत्व रखता है।

हिंदी के प्रथम साहित्यकार प्रेमचन्द का जन्म वाराणसी जिले (उत्तर प्रदेश) के लमही नामक गाँव में 31 जुलाई, 1880 को हुआ था। इनका वास्तविक नाम धनपत राय था। इनके पिता का नाम अजायब लाल था जो लमही में डाकमुंशी थे। इनकी माता का नाम आनंदी देवी था।

 👉इनको बचपन से ही पढ़ने का शौक था। इन्हें गांव से दूर वाराणसी पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाना पड़ता था। जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रेमचंद ने मैट्रिक पास किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य, और इतिहास विषयों से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी।

इनका विवाह 1905 ई. में शिवरानी देवी से हुआ था।

👉प्रेमचंद जी पहले उर्दू भाषा में नवाबराय के नाम से कहानियाँ लिखते थे। बाद में वे हिंदी में आए तो प्रेमचंद के नाम से कहानियाँ लिखने लगे।

इनकी ‘’सोजे वतन’’ नामक क्रांतिकारी रचना ने स्वाधीनतासंग्राम में ऐसी हलचल मचाई कि अंग्रेज सरकार ने उनका पहला कहानी-संग्रह, ‘सोजे वतन जब्त कर लिया, तब उन्हें नवाबराय' नाम छोड़ना पड़ा। बाद का उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित हुआ।

👉साहित्यिक परिचय-

 प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था। उन्होनें साहित्य में जनजीवन को स्थान दिया। वे स्वयं आजीवन आर्थिक अभावों का सामना करते रहे और उन्होनें अपने आस-पास आर्थिक और सामाजिक शोषण को नजदीक से देखा। इन्होंने माधुरी तथा मर्यादा पत्रिकाओं का सम्पादन किया। जनता की बात जनता की भाषा में कहकर तथा अपने कथा साहित्य के माध्यम से तत्कालीन, निम्न एवं मध्यम वर्ग का सच्चा चित्र प्रस्तुत करके प्रेमचंद जी भारतीयों के हृदय में समा गये।  

👉रचनाएँ-

प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उनकी रचनाओं का वर्णन इस प्रकार है-

 उपन्यास-

सेवासदन(1918), प्रेमाश्रम(1922), रंगभूमि(1924), कायाकल्प(1926), निर्मला(1928), गबन(1931), गोदान(1936), और मंगलसूत्र(अंतिम एवं अपूर्ण)। गोदान हिंदी का एक श्रेष्ठ उपन्यास है।   

प्रमुख उपन्यास

  • सेवासदन (1918): स्त्री जीवन और वेश्यावृत्ति की समस्या।
  • निर्मला (1927): दहेज और अनमेल विवाह की त्रासदी।
  • रंगभूमि (1925): किसान और जमींदार संघर्ष।
  • गबन (1931): मध्यमवर्गीय जीवन की विडंबनाएँ।
  • कर्मभूमि (1932): स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि।
  • गोदान (1936): किसान जीवन का महाकाव्य, उनकी अंतिम और सर्वश्रेष्ठ कृति।

 कहानी संग्रह-

प्रेमचंद जी ने लगभग 400 कहानियों की रचना की। सप्त सरोज, नवनिधि, प्रेम पूर्णिमा, प्रेम प्रतिमा, प्रेम पचीसी, पंच परमेश्वर, पूस की रात, समर-यात्रा, मानसरोवर, कफन, दूध का दाम, बड़े घर की बेटी आदि प्रमुख है।

नाटक- कर्बला, संग्राम और प्रेम की वेदी। 

निबंध-संग्रह-  कुछ विचार, विविध प्रसंग।

 👉साहित्यिक विशेषताएँ- 

       प्रेमचंद एक यथार्थवादी कथाकार थे। प्रेमचंद जी ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने समाज के सभी वर्गों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उन्होंने विशेषकर ग्रामीण किसानों और मजदूरों की दलित अवस्था का मार्मिक चित्रण किया है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में वेश्यावृति की समस्या, अछूतों की समस्या, अनमेल विवाह और किसानों का शोषण आदि प्रश्नों को उठाया गया है। गोदान प्रेमचन्द की कीर्ति का आधार स्तम्भ है।

👉भाषा शैली-

 प्रेमचन्द जी उर्दू से हिंदी में आये, इसलिए प्राय: सहज, सरल और बौद्धगम्य हिंदी भाषा का वर्णन किया है। इनकी भाषा न किताबी हिंदी है और न किताबी उर्दू, वह सहज हिंदी भाषा है। जिसमें तत्सम, तद्भव, मिश्रित तथा विदेशी शब्दों का सुंदर वर्णन है। संक्षेप में उनकी भाषा शैली उच्चकोटि की कही जा सकती है। 

 👉मृत्यु- निरन्तर साहित्य लेखन करते हुए 8 अक्तूबर, 1936 को प्रेमचंद जी का निधन हो गया।

 👉निष्कर्ष- 

मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) हिन्दी और उर्दू साहित्य के महानतम उपन्यासकार एवं कथाकार माने जाते हैं। उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ कहा जाता है और उनकी रचनाएँ भारतीय समाज के यथार्थ, किसान जीवन, स्त्री संघर्ष और सामाजिक सुधारों का जीवंत चित्रण करती है।

 

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