संत रैदास का जीवन परिचय
👉संत रैदास 15वीं–16वीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे, जिन्होंने समानता, प्रेम और निर्गुण भक्ति का संदेश
दिया। रैदास जिन्हें हम रविदास जी के नाम से भी जानते है का जन्म 1388
ई. में काशी (बनारस) में हुआ था।
कहते है- कि माघ की
पूर्णिमा को जब रैदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास
रखा गया। रैदास ने अपने को एकाधिक स्थानों पर चमार जाती का कहा है।
“नीचे से प्रभु आंच कियो कह रैदास चमारा”
रैदास के पिता का नाम श्री
संतोख दास जी और माता का नाम कलसा देवी था। इनका विवाह लोना देवी से
हुआ और इनके बेटे का नाम विजय दास था।
👉रैदास का जन्म काशी में चर्मकार कुल में
हुआ था। जूते बनाने का कार्य उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होनें इसे सहर्स
अपनाया। साधु–सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनंद मिलता था। वे
उन्हें प्राय: मूल्य लिए बिना जूते भेंट कर देते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके
माता पिता उनसे प्रसन्न नहीं थे। कुछ समय बाद उन्होनें रैदास तथा उनकी पत्नी को
अपने घर से अलग कर दिया।
रैदास पड़ोस में ही एक अलग
झोपड़ी बनाकर रहने लगे और अपना जीवन ईश्वर भजन एवं साधु-संतो की संगत मे रहकर
व्यतित करने लगे।
👉रैदास जी ने ईश्वर को सर्वव्यापक तथा स्वयं को लघु माना है। संत रविदास ने अपने ज्ञान से समाज को संदेश दिया कि व्यक्ति बड़ा या छोटा अपने जन्म से नहीं अपितु अपने कर्म से होता है। वे धर्म के मार्ग पर चलने वाले महान पुरुष थे। रैदास भी कबीर की ही तरह रामानंद के शिष्य थे। संत रामानंद के शिष्य बनकर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया।
वे निर्गुण भक्ति के समर्थक थे और ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापी मानते थे। कबीर के समकालीन कवियों में रैदास का बड़ा महत्व है। कबीरदास ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है।
मीराबाई ने रैदास का उल्लेख आदरपूर्वक किया है एवं मीराबाई को रैदास की शिष्या माना जाता है। वे रविदास जी की शिक्षा से बहुत अधिक प्रभावित हुई थी और वे उनकी बड़ी अनुयायी बन गई थी। मीराबाई ने अपने गुरु के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ भी लिखी है-
‘गुरु मिलया रविदास जी’
👉
रैदास पदावली, रैदास की वाणी।
रैदास के 41 पद सिख धर्म
के गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। कुछ फुटकर पद सतबानी में है। रैदास की भक्ति
भी कबीर की तरह निर्गुणवादी है। किन्तु उनका स्वर कबीर जैसा आक्रमक नहीं है।
गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा को उन्होंने भक्ति का हिस्सा माना। इन्हें ‘दलित कवि’ कहा गया
है।
संत रविदास ने कहा है- कि
मनुष्य महान जन्म से नहीं, बल्कि कर्मों से होता है।
👉भाषा शैली-
रैदास की भाषा सरल, सुबोध, प्रभावमयी
एवं गेयता गुणों से युक्त है। उस समय बोलचाल में फारसी का बड़ा महत्व था। इस कारण
उनके पदों में फारसी के शब्दों की अधिकता है। उनके पदों में समानता, प्रेम, करुणा और
भक्ति का अद्भुत संगम है।
इन्होंने जाति-पाति का
विरोध किया- “जाति पाति पूछे नहीं कोई, हरि को
भजे सो हरि का होई।”
👉हिंदी पंचांग के अनुसार- माघ की पूर्णिमा में जन्म लेने के कारण माघ महीने की पूर्णिमा तिथि को हर वर्ष गुरु रविदास जयंती मनाई जाती है। क्योकि इनकी जन्म तिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।
मृत्यु-
रैदास जी की मृत्यु सन् 1518 ई. में वाराणसी में हुई मानी गई है।
👉निष्कर्ष-
संत रैदास वाराणसी में
जन्मे और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध खड़े होकर भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी।
इन्होंने अपने जीवन और काव्य से समाज को समानता, प्रेम और
निर्गुण भक्ति का अमूल्य संदेश दिया। उन्होंने रविदासिया पंथ की स्थापना की, जिसके
अनुयायी आज भी पंजाब, उत्तर प्रदेश,
राजस्थान और विदेशों में पाए जाते है।
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