कबीर दास जी का जीवन परिचय KABIR DAS KA JIWAN PARICHYE

                                                           कबीर दास जी का जीवन परिचय 



 कबीर दास जी का जन्म सन 1398 में वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में माना जाता हैं। उनके जीवन के बारे   में अलग-अलग विचार, विपरीत तथ्य और कई कथाएं हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि कबीर जुलाहा   (बुनकर) थे, कयोंकि उन्होंने अपने को दोहों में जुलाहा कहा है-

     "जाति जुलाहा, नाम कबीरा बनि बनि फिरो उदासी।'   

कहा जाता है कि वे विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे, जिसने लोकापवाद के भय से कबीर के जनमते ही, उन्हे काशी के लहरतारा ताल के पास छोड़ दिया था। नीरु नामक जुलाहा बच्चे को अपने घर ले आया। इस प्रकार उनका पालन–पोषण एक गरीब जुलाहा परिवार में नीरू और नीमा ने किया। बाद में वे जुलाहा ही प्रसिद्ध हुए। एसा मत है कि कबीर दास जी का विवाह 13 वर्ष की आयु में हुआ, उनकी पत्नी का नाम लोई तथा पुत्र व पुत्री का नाम कमाल और कमाली था। 

कबीर ने काशी के प्रसिद्ध महात्मा रामानंद को अपना गुरु माना है। कहा जाता है, कि रामानंद जी ने नीच जाति का समझकर कबीर को अपना शिष्य बनाने से इनकार कर दिया था, तब एक दिन कबीर गंगा तट पर जाकर सीढ़ियों पर लेट गये जहां रामानंद जी प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने जाया करते थे।

अंधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ा और उनके मुख से राम राम निकला तभी से कबीर ने रामानंद जी को अपना गुरु और राम नाम को गुरु मंत्र मान लिया। कुछ विद्वानों ने प्रसिद्ध सूफी फकीर शेखतकी को कबीर का गुरु माना है।

कबीर अनपढ थे, एक दोहे में उन्होंने कहा है-

            ”मरि कागद छुयौ नहिं, कलम गह्यौ हाथ''। साधु-संतों और फकीरों की संगति में बैठकर उन्होंने वेदांत, उपनिषद और योग का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

कबीर की वाणी का संग्रह “बीजक” कहलाता है। इसके तीन भाग हैं – 1. साखी (साक्षी), 2. सबद (शब्द) और 3. रमैनी (रामायण) है। साखी में दोहे हैं, सबद में गेय पद तथा रमैनी में चौपाई और दोहे हैं। सबद और रमैनी ब्रजभाषा में हैं। कबीर साहसपूर्वक जन – बोली के शब्दों का प्रयोग अपनी काव्य रचनाओ में करते थे। बोली के ठेठ शब्दों के प्रयोग के कारण ही कबीर को “वाणी का डिक्टेटर” कहा है।  

कबीर की मृत्यु मगहर जिला बस्ती में सन्‌ 1518 में हुई। ऐसा माना जाता है कि कबीर दास की मृत्यु के बाद, हिंदुओं और मुसलमानों ने कबीर दास का शव प्राप्त करने का दावा किया था। वे दोनों कबीर दास के शव का अंतिम संस्कार अपने-अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार करना चाहते थे। हिंदुओं ने कहा कि वे शरीर को जलाना चाहते हैं क्योंकि वह एक हिंदू था और मुसलमानों ने कहा कि वे उसे मुस्लिम संस्कार के तहत दफनाना चाहते हैं क्योंकि वह एक मुसलमान था। लेकिन, जब उन्होंने शव से चादर हटाई तो उन्हें उसके स्थान पर केवल कुछ फूल मिले। उन्होंने एक-दूसरे के बीच फूल बांटे और अपनी-अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया।

 

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