लोकोक्तियाँ (LOKOKTIYAN)
लोकोक्तियाँ
लोकोक्ति शब्द लोक + उक्ति से बना है जिसका अर्थ है लोक में प्रचलित उक्ति या कथन। लोकोक्तियाँ/कहावतें आम बोलचाल में इस्तेमाल होने वाले वाक्यांश को कहते है जिसका सम्बन्ध किसी न किसी पौराणिक कहानी से जुड़ा हुआ होता है। लोकोक्तियाँ किसी बात का समर्थन, विरोध अथवा खंडन करने के लिए प्रयोग में ली जाती है।
हिंदी में प्रचलित लोकोक्तियाँ
1 1. अपनी-अपनी
ढपली अपना-अपना राग (विचारों में भिन्नता होना)
2 2. ओखली
में सिर दिया, तो
मुसलों से क्या डर (काम करने को उतारु होना)
3 3. नेकी
और पूछ-पूछ कर (नेकी करने से पहले पूछने की जरुरत नहीं होती)
4 4. एक पंथ
दो काज (एक काम से दूसरा काम हो जाना)
5 5. एक तबे
की रोटी, क्या
छोटी क्या मोटी (सभी लगभग एक से होना)
1 6. घर का
जोगी जोगड़ा, आन
गाँव का सिद्ध (निकट का गुणी व्यक्ति कम सम्मान पाता है, पर दूर का
ज्यादा)
2 7. तेल देखो तेल की धार देखो (रुख पहचानना)
3 8. जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ (परिश्रम का
फल अवश्य मिलता है)
4 9. जो गरजते हैं वे बरसते नहीं (जो व्यक्ति बहुत बोलते है वे विशेष सफल नहीं होते)
10 अंधों में काना राजा (मूर्खों में कुछ पढ़ा-लिखा व्यक्ति)
11 खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है (पड़ोस का असर पड़ता ही है)
12 अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता (अकेला आदमी लाचार होता है)
13 होनहार बिरवान कि होत चीकने पात (महान बनने वाले व्यक्तियों के गुण बचपन में/ पालने में ही नजर आने लगते है)
14 अधजल गगरी छलकत जाए (डींग हाकना या ओछा व्यक्ति प्रदर्शन बहुत करता है)
15 खोदा पहाड़ निकली चुहिया (परिश्रम को देखते हुए बहुत कम फल मिलना)
16 आँख का अंधा नाम नयनसुख (गुण के विरुद नाम होना)
17 हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष को प्रमान की आवश्यकता नहीं है)
18 आँख के अंधे गाँठ के पूरे (मूर्ख धनवान)
1 19 खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे (किसी बात पर शर्मिन्दा होकर क्रोध करना)
20 आगे नाथ न पीछे पगहा (किसी तरह की जिम्मेवारी का ना होना)
21 तू डाल-डाल मैं पात-पात (जैसे को तैसा)
22 आम के आम गुठलियों के दाम (दोहरा लाभ)
23 चौबे गए छब्बे बनने दुबे ही रह गए (लाभ के स्थान पर हानि होना)
24 ऊँची दुकान फीका पकवान (केवल बाह्रा प्रदर्शन)
25 आँख न दीदा काढे कसीदा (साधन न होने पर भी काम कर लेना)
26 ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती (बहुत थोड़ी सी वस्तु मिलने से तृप्ति नहीं मिलती)
27 नाच न जाने आँगन टेढ़ा (काम न जानना और बहाना बनाना)
28 जो बोले सो कुंडा खोले (जो सुझाव दे, वही उसकी जिम्मेदारी उठाए)
29 न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी (न कारण होगा, न कार्य होगा)
30 सावन हरे न भादों सूखे (सदा एक समान रहना)
31 चिराग तले अंधेरा (अपनी बुराई नहीं दिखती)
32 छछूँदर के सिर में चमेली का तेल (अयोग्य व्यक्ति को भारी यश या बड़ा पद मिलना)
33 होनहार बिरवान के होते चीकने पात (होनहार के लक्षण पहले से ही दिखाई पड़ने लगते है)
34 मान न मान मैं तेरा मेहमान (जबरदस्ती गले पड़ना)
35 ऊँची दुकान फीका पकवान (केवल बाह्रा प्रदर्शन)
36 जंगल में मोर नाचा किसने देखा (किसी ऐसे स्थान पर काम करना जिससे किसी को लाभ न हो)
37 गधा खेत खाए जुलहा पीटा जाए (अपराध कोई करे और दण्ड किसी अन्य को मिले)
38 चोर-चोर मौसेरे भाई (एक पेशे वाले आपस में नाता जोड़ लेते है)
39 खाली दिमाग शैतान का घर (बेकार बैठने से तरह-तरह की खुराफातें सुझती है।
40 गागर में सागर भरना (कम शब्दों में बहुत कुछ कहना)
41 गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है (अपराधियों के साथ निर्दोष व्यक्ति भी दण्ड पाते है)
42 गरीब की जोरु, सबकी भाभी (कमजोर पर सब अधिकार जताते है)
43 गोद में छोरा नगर में ढिंढोरा (पास की वस्तु को दूर जाकर ढूँढना)
44 आसमान से गिरा खजूर में अटका (एक विपत्ति के बाद दूसरी विपत्ती में आना)
4 45 हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और (दोहरा व्यवहार करना)
46 काला अक्षर भैंस बराबर (बिल्कुल अनपढ़ व्यक्ति)
47 कुतों के भौंकने से हाथी नहीं डरते (विद्धवान लोग मूर्खो और ओछो की बातों की परवाह नहीं करते)
48 आधा तीतर आधा बटेर (अनमेल मिश्रण)
49 आम खाने या पेड़ गिनने (व्यर्थ की बातें न करके केवल अपने मतलब की बात करनी चाहिए)
50 जल में रहकर मगर से बैर (स्वामी से शत्रुता करना)
51 कोठी वाला रोवै, छप्पर वाला सोवै (अधिक धन चिंता का कारण बनता है)
52 भूस में आग लगा जमालो दूर खड़ी (कलह का बीज बोकर तटस्थ रहना)
53 न अंधे को न्यौता देते न दो जने आते (न यह काम करते न मुसीबत आती)
54 घी का लड्डू टेढ़ा भला (काम की वस्तु कुरुप होने पर भी ठीक समझी जाती है)
55 पढ़े फारसी बेचे तेल, यह देखो कुदरत का खेल (योग्यता होते हुए भी विवशता के कारण निम्न स्तर का कार्य करना)
56 कूद-कूद मछली बगुले को खाए (विपरीत कार्य होना)
57 घोड़ा घास से यारी करे तो खाएगा क्या? (अपना हक लेने में लिहाजा न करना)
58 एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा (जो बुरा है, उसका साथी भी बुरा हो जाना)
59 घर में नहीं दाने, बीबी चली भुनाने (सामर्थ्य से बाहर के बाहर काम करना)
60 घर की खाँड़ किरकिरी लागे, बाहर का गुड़ मीठा (सरलता से उपलब्ध होने वाली श्रेष्ठ वस्तु भी अच्छी नहीं लगती है)
61 आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास (मुसीबत में फँसना)
62 कोयले की दलाली में हाथ काले (बुरी संगत में कलंक लगता ही है)
63 चील के घौसले में माँस कहाँ (जहाँ कुछ भी बचने की सम्भावना न हो)
64 आगे कुआँ पीछे खाई (विपत्ति से बचाव का कोई मार्ग नहीं)
65 एक हाथ से ताली नहीं बजती (झगड़ा एक ओर से नहीं होता)
66 चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात (सुख क्षणिक ही होता है)
67 नौ सौ चुहे खाए बिल्ली हज को चली (जीवन भर पाप करने के बाद बुढ़ापे में धर्मात्मा होने का ढोंग करना)
68 राम नाम जपना पराया माल अपना (धर्म का आडम्बर करते हुए दूसरों की सम्पति हड़पना)
69 गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज (ढोंग करना)
70 एक अनार सौ बीमार (एक वस्तु के ग्राहक अनेक)
71 कंगाली में आटा गीला (दु:खी पर और अधिक दु:ख आना)
72 का बरखा जब कृषी सुखाने (काम बिगड़ने पर सहायता व्यर्थ होती है)
73 गंगा गए तो गंगादास, जमना गए तो जमनादास (परिस्थिति के अनुसार विचार बदलने वाला अस्थिर व्यक्ति)
74 घर का भेदी लंका ढ़ाए (आपस की फूट से सर्वनाश होता है)
75 चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात (थोड़े दिन की मौज फिर वही कष्ट)
76 जाको राखें साइयाँ मार सकै न कोय (जिसका भगवान रक्षक है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता)
77 जैसा देश वैसा भेष (जहाँ रहो वहाँ के रीति-रिवाजों के अनुसार रहो)
78 दूर के ढ़ोल सुहावने (परिचय के अभाव में वस्तु का आकर्षक लगना)
79 बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय (गलत कार्य का परिणाम भी गलत होता है)
80 न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी (कार्य करने के लिए कोई असाधारण बहाना बनाना शर्त रख देना)
81 नौ दिन चले अढ़ाई कोस (बहुत धीमी गति से काम करना।
82 अपना दाम खोटा तो परखैया को क्या दोष (खराब वस्तु को खराब बताने वाले व्यक्ति का कोई दोष नहीं होता है)
83 कहने से कुम्हार गधे पर नहीं चढ़ता है (हीनभाव का शिकार होना)
84 उतर गई लोई, तो क्या करेगा कोई? (बदनाम व्यक्ति को बुराई का क्या डर?)
85 अंधी पीसे कुत्ता खाएं (असावधानी से किए जाने वाले कार्य द्वारा अयोग्य व्यक्ति/ व्यक्तियों को लाभ होता है)
86 घी खाया बाप ने सूँघी मेरे हाथ (दूसरे के श्रेष्ठ कार्य का श्रेय स्वयं लेना)
87 इमली के पात पर बारात का डेरा (असम्भव बात)
88 घड़ी में घट जले, अढाई घड़ी भद्रा (संकट को टालने की बजाए सूझ-बूझ से काम लेकर उसको दूर करना चाहिए)
89 बिना रोए तो माँ भी दूध नहीं पिलाती (बिना यत्न किए कुछ भी नहीं हो सकता)
90 अक्ल बड़ी या भैंस (बुद्धि शारीरिक शक्ति से श्रेष्ठ होती है)
91 अपने मुँह मियां मिट्ठू (अपने मुँह से अपनी बड़ाई करने वाला व्यक्ति)
92 अभी दिल्ली दूर है (अभी काम पूरा होने में देर है)
93 घर की मुर्गी दाल बराबर (अपने आदमी को कम महत्व देना)
94 अपना हाथ जगन्नाथ (अपने सामर्थ्य पर दृढ़ विश्वास)
95 जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ न पहुँचे कवि (कवि बहुत कल्पनाशील होते है)
96 पाव भर चून पुल पर रसोई (सीमित साधन होने पर भी अधिक व्यक्तियों को निमन्त्रित कर देना)
97 धोबी का कुत्ता घर का न घाट का (किसी का भी विश्वास पात्र न होना)
98 आपु न जावे सासुरे औरन कूँ सिख देइ (स्वयं कोई काम न करना और उसको करने के लिए अन्य व्यक्तियों से कहना)
99 अंधे के आगे रोवै नैना अपने खोवै (जो अपने कष्ट को न समझे उसके सामने अपना दु:ख नहीं कहना चाहिए)
100. घर आए नाग न पूजिए बाँबी पूजन जाय (अवसर से लाभ न उठाए और बाद में परेशान करे)
101. थोथा चना बाजे घना (अल्पज्ञ व्यक्ति अधिक बोलता है)
102. घाव पर नमक छिड़कना (दुखी को अधिक दुखी करना)
103. खूब मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी (एक ही प्रकार के दो मनुष्यों का साथ)
104. काम का न काज का, दुश्मन अनाज का (किसी मतलब का न होना)
105. गुड़-गुड़ ही रहा, चेला शक्कर हो गया (शिष्य का गुरु से अधिक उन्नति करना)
106. अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है (अपनी घर या गली-मोहल्ले में बहादुरी दिखाना)
107. चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता (बेशर्म आदमी पर किसी बात का कोई असर नहीं होता)
108. जिसकी बिल्ली, उसी को म्याऊँ (जब किसी के द्वारा पाला-पोसा व्यक्ति उसी को आँखे दिखाए)
109. चलती का नाम गाड़ी (हस्ती समाप्त होने पर भी धाक जमी रहना)
110. छोटा मुँह बड़ी बात (कम उम्र या अनुभव वाले मनुष्य का लम्बी-चौड़ी बातें करना)
111 जितना गुड़ डालोगे, उतना ही मीठा होगा (जितना अधिक रुपया खर्च करेंगे, उतनी ही अच्छी वस्तु मिलेगी)
112. जल्दी का काम शैतान का, देर का काम रहमान का (जल्दी करने से काम बिगड़ जाता है और शांति से काम ठीक होता है)
113. झूठे का मुहँ काला, सच्चे का बोलबाला (अंत में सच्चे आदमी की जीत होती है)
114. जितनी चादर हो, उतने ही पैर फैलाओं (आदमी को अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार ही काम करना चाहिए)
115. कहत धतूरे सौं कनक गहनो गढ़ो न जाए (नाम के आकर्षण होने से काम नही चलता)
116. ओखली में सिर देना (जान-बूझकर आपत्ति मोल लेना)
117. अंधे के आगे रौवे, नैना अपने खोवे (जो अपने कष्ट को न समझे उसके सामने अपना दुख नहीं कहना चाहिए)
118. अशर्फियाँ लुटें और कोयले पर छाप (मूल्यवान वस्तुओं की ओर ध्यान न देकर साधारण वस्तुओं की चिंता करना)
119. छप्पर पर फूंस नहीं, डयोढ़ी पर नाच (दिखावटी ठाट-बाट परन्तु वास्तविकता में कुछ नहीं)
120. जल्दी का काम शैतान का, देर का काम रहमान का (जल्दी करने से काम बिगड़ जाता है और शांति से काम ठीक होता है)
Comments
Post a Comment