KARAK--कारक (विभक्ति-विचार)(case)
कारक
(विभक्ति-विचार)(case)
संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के जिस रुप
से उसका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों(क्रिया) से जोड़ा जाता है, उसे ही
कारक कहते है। जैसे- सोहन ने मोहन को किताब दी।
(इस वाक्य में ‘ने’ और ‘को’ कारक का प्रयोग किया गया है।)
डॉ. वासुदेव नन्दन प्रसाद के
अनुसार-
‘’संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप
से उनका (संज्ञा या सर्वनाम) क्रिया से सम्बन्ध सूचित हो, उस
रुप को कारक कहते है’’।
विभक्ति चिन्ह-
कारक
को सूचित (प्रकट) करने के लिए संज्ञा या सर्वनाम के साथ जो प्रत्यय या चिन्ह लगाए
जाते है उन्हें विभक्ति या विभक्तियाँ (परसर्ग) कहा जाता है।
कारक के भेद-
हिंदी
में आठ कारक है-
कारक विभक्ति चिन्ह
1 1. कर्ता ने
2 2. कर्म को
3 3. करण से, के द्वारा
4 4. सम्प्रदान को, के लिए
5 5. अपादान से
6 6. सम्बन्ध का, की, के, रा, री, रे
7 7. अधिकरण में, पर
8 8. सम्बोधन हे, अरे, अजी आदि।
वाक्य में जो शब्द कार्य या काम करने वाले
के अर्थ में आता है, उसे कर्ता
कहते है। जैसें-
राम खाता है।(इस वाक्य में खाने का काम राम करता है, राम कर्ता
है।)
कर्ताकारक का विभक्तिचिन्ह ‘ने’ होता है।
उदाहरण-
1 सोहन ने दरवाजा खोला।
2 श्याम ने रोटी खाई।
3 किशोर ने खाना खा लिया।
1 2. कर्मकारक(Objective)-
वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता
है, उसे कर्मकारक कहते है। जैसें-
मैंने पत्थर फेंका। (इस
वाक्य पत्थर कर्म है।)
उसने रामू को बुलाया। (इस
वाक्य रामू कर्म है।)
कर्मकारक का विभक्तिचिन्ह ‘को’ होता है।
उदाहरण-
1 माँ ने बच्चे को सुलाया।
2 मैंने हरि को बुलाया।
3 मैंने बच्चों को मिठाई
खिलाई।
3. करणकारक(Instrumental)-
वाक्य में
जिस शब्द से क्रिया के
सम्बन्ध का बोध हो या संज्ञा के जिस रुप से क्रिया के साधन का बोध हो उसे करणकारक कहते है। जैसें- उसने लाठी से कुत्ते को मारा। (इस वाक्य में लाठी शब्द करणकारक है।)
करणकारक का विभक्तिचिन्ह ‘से, के द्वारा’ है।
उदाहरण-
1 वह कुल्हाड़ी से वृक्ष
काटता है।
2 मुझे अपनी कमाई से खाना मिलता
है।
1 4. सम्प्रदानकारक(Dative)-
वाक्य में
जिसके लिए कुछ किया जाए
या जिसको कुछ दिया जाए, इसका बोध कराने वाले शब्द के रुप को सम्प्रदानकारक कहते है।
सम्प्रदानकारक का विभक्तिचिन्ह
‘को, के लिए’ है।
उदाहरण-
1 मैं राधा के लिए साड़ी
लाया।
2 राजा ने साधु को भोजन
कराया।
(इन वाक्यों में राधा और
साधु शब्द सम्प्रदानकारक है।)
1 5. अपादानकारक(Ablative)-
अपादान का अर्थ है- अलगहोना। संज्ञा के जिस रुप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है उसे अपादानकारक कहते है। अपादानकारक का विभक्तिचिन्ह ‘से’ है।
उदाहरण-
1 हिमालय से गंगा निकलती है।
2 पेड़ से फल गिरा।(पेड़ से
अपादानकारक है।)
3 चूहा बिल से बाहर निकला।
( इन वाक्यों में हिमालय से, पेड़ से और बिल से अपादानकारक है।)
1 6. सम्बन्धकारक(Genitive)-
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रुप
से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध
या लगाव प्रतीत हो, उसे सम्बन्धकारक कहते है। सम्बन्धकारक
का विभक्तिचिन्ह ‘का, की, के, रा, री, रे’ है।
उदाहरण-
1 यह राम की पुस्तक है।
2 सुनीता का घर दूर है।
3 राहुल की किताब मेज पर है।
1 7. अधिकरणकारक(Locative)-
संज्ञा के
जिस रुप से क्रिया के आधार
का बोध होता है उसे
अधिकरणकारक कहते है। अधिकरणकारक का विभक्तिचिन्ह ‘में, पर’ है।
उदाहरण-
1 शेर वन में रहता है।
2 घर पर माँ है।
3 पुस्तक मेज पर है।
(इन वाक्यों में वन में, घर पर और मेज पर अधिकरणकारक है।)
1 8. सम्बोधनकारक(Address/
Vocative)-
संज्ञा के जिस रुप से किसी के पुकारने
या संकेत करने का भाव पाया
जाता है उसे सम्बोधनकारक
कहते है। सम्बोधनकारक का कोई
विभक्तिचिन्ह नहीं होता है इसे प्रकट करने के लिए ‘हे, अरे, अजी’ शब्दों का प्रयोग
होता है।
उदाहरण-
1 हे भगवान! मेरी रक्षा
कीजिए।
2 अरे! इधर आओ।
3 अजी! सुनते हो।
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