R Vyanjan (‘’र’’ व्यंजन के विभिन्न रुप)
‘’र’’ व्यंजन के विभिन्न रुप
हिन्दी
वर्णमाला स्वर और व्यंजनो से मिलकर बनती हैं। हिन्दी की वर्णमाला में ‘’र’’ व्यंजन का एक विशेष स्थान हैं
क्योकि इसका प्रयोग शब्दों को लिखने में कई तरीकों से किया जाता हैं।
‘’र’’ एक अन्त:स्थ व्यंजन (य, र,
ल, व) हैं। ‘’र’’ अल्पप्राण, घोष तथा मूर्धन्य ध्वनि भी हैं।
‘’र’’ व्यंजन की विशेषता हैं कि यह मात्रा के रुप में
दूसरे व्यंजन के साथ जुड़ता हैं जैसें - क्रम, कार्य, ट्रक।
‘’र’’ की अपनी कोई मात्रा नही होती। मात्राएँ केवल
स्वरों की होती हैं। ‘’र’’ के विभिन्न
रुप होते हैं जिनका प्रयोग अनेक प्रकार से हिन्दी के शब्दों में किया जाता हैं।
‘’र’’ व्यंजन के विभिन्न रुप-
1. ‘’र’’ का सामान्य रुप
2. ‘’र’’ का रेफ रुप
3. ‘’र’’ का पदेन रुप
1 खड़ी पाई के व्यंजनों मेंं ''र'' का पदेन रुप
2. बिना पाई के घुमावदार व्यंजनों में ''र'' का पदेन रुप
11. ''र'' का सामान्य रुप –
जब ‘’र’’ का प्रयोग स्वर
सहित (पूरा ‘’र’’) शब्दों के साथ होता
हैं तो उसे ‘’र’’ का सामान्य रुप कहते
हैं जैसें- रमेश, रहीम, रवि।
रमेश = र (र् + अ = र)
12. ‘’र’’ का रेफ रुप (र्क) –
स्वर रहित ‘’र्’’ (आधा र) को रेफ कहते हैं। जब यह दो वर्णों के बीच में आता हैं तो यह अपने
से पीछे के वर्ण के ऊपर सी (c) के आकार में लगता हैं जैसे-
कर्म – क र् म
धर्म – ध र् म
दर्द – द र् द
खर्च- ख र् च
उदाहरण- गर्म, वर्ष, वर्ण, वर्ग,
सूर्य, पूर्व, माधुर्य,
निर्गुण, अर्पण।
‘’र’’ के रेफ रुप के नियम-
1. रेफ की मात्रा वर्ण के ऊपर (सी के आकार में) लगती हैं।
इसमें वर्ण पूरा होता हैं और र आधा (र्) होता हैं।
2. रेफ की मात्रा कभी भी स्वरों के साथ प्रयोग नहीं होती।
3. रेफ की मात्रा अपने से पीछे वाले वर्ण पर लगती हैं यदि पीछे
वाला वर्ण मात्रा युक्त होता हैं तो ‘’र्’’ पीछे वाले वर्ण की मात्रा के साथ जुड़ता हैं
जैसें-
प्राचार्या- प्रा चा र् या
गर्मी – ग र् म ई
आशीर्वाद – आ शी र् वा द
पर्यावरण – प र् या व रण
4. आधे वर्ण पर कभी भी रेफ की मात्रा नहीं लगती, वह हमेशा पूर्ण वर्ण पर लगती हैं जैसें-
पार्श्व – पा र् श् व
वर्त्स्य- व र् त् स् य
दुर्व्यवहार – दु र् व् य व हा र
3.''र'' का पदेन रुप-
‘’र’’ का पदेन रुप दों प्रकार से प्रयोग होता हैं-
1. खड़ी पाई के व्यंजनों में
1 1. खड़ी पाई के
व्यंजनों में ‘’र’’
का पदेन रुप-
खड़ी पाई के व्यंजन (क, ख, ग, च, म, व) में ‘’र’’ का पदेन रुप पाई के नीचे पैर में तिरछी रेखा के
रुप में लगाया जाता हैं जैसें- क्र, ग्र, प्र। जब कोई व्यंजन स्वर रहित हो या आधा हो और उसके साथ ‘’र’’ पूरा हो तो वहाँ ‘’र’’
का पदेन रुप होता हैं।
उदाहरण-
1. व्रत = व् र त
पाई रहित घुमावदार व्यंजनों (ड., छ, ट, ठ, ड, ढ) में ‘’र’’ का पदेन रुप अंग्रेजी के अक्षर (v) के उल्टे आकार के रुप में प्रयोग होता हैं जैसें- ट्र, ठ्र, ड्र। इसमें वर्ण आधा होता हैं और ‘’र’’ पूरा होता हैं।
उदाहरण-
1. ट्रक= ट् र क
2. ड्रम = ड् र म
3. राष्ट्र = रा ष् ट् र
4. ट्रेन = ट् रे न
‘’द’’ और ‘’ह’’ के साथ ‘’र’’ का प्रयोग-
‘’द’’ और ‘’ह’’ ऐसे व्यंजन हैं जो न तो खड़ी पाई वाले व्यंजन हैं और न ही पूरी तरह
घुमावदार व्यंजन हैं ‘’द’’ और ‘’ह’’ के नीचे ‘’र’’ का पदेन रुप एक तिरछी रेखा के रुप में लगता हैं जैसें- द्रव, द्रव्य, दरिद्र, समुद्र,
ह्रस्व, ह्रास, ह्रदय।
‘’त्’’ के साथ ‘’र’’ का प्रयोग अलग होता है-
‘’त’’ खड़ी पाई वाला और स्पर्श व्यंजन हैं
लेकिन ‘’त्’’ में ‘’र’’ का प्रयोग करके (त् + र = त्र) बनता हैं।
उदाहरण
–
नक्षत्र= न क्ष त् र
त्रिशूल = त् र इ शू ल
छात्र = छा त् र
एकत्र = ए क त् र
‘’श्’’ के साथ ‘’र’’ का प्रयोग अलग होता हैं-
‘’श्’’ एक उष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) और खड़ी पाई का व्यंजन
भी हैं लेकिन ‘’श्’’ में ‘’र’’ का प्रयोग करके
(श् +
र = श्र) बनता हैं जैसें-
श्रमिक – श् र म् इ क
परिश्रम – प र् इ श् र म
Nice
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